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ओडीशा में साईं धारा प्रवाह

ओडीशा प्रांत  प्राचीन काल से ही धार्मिक , अध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संपदा में धनी रहा है, जिसके चलते ओडीशा में जन्मे प्रत्येक वासी , इन संपदाओं को , विरासत में पाता है।

पूजनीय गुरुजी श्री चंद्रभानु सतपथीजी ने, ओडीशा वासियों के उच्च धार्मिक अध्यात्मिक पृष्ठभूमि का सर्वोच्चतम शिखर तक विकास हेतु, सद्‌गुरु शिरडी साईं के संदेश लाने और सामीप्य दिलाने का प्रयास किया है क्योंकि चेतना का विकास सद्‌गुरु की छांव तले , श्रद्धा और सबुरी युक्त , मानवता के धर्म से ही संभव है।

श्री गुरुजी के अथक प्रयास से शिरडी साईं का मानवता का संदेश जो कि शुद्ध आचरण, सहिष्णुता, प्रेम, श्रद्धा और सबुरी में निहित है/आधारित है, आज ओढ़ीसा के जन मानस तक पहुंच रहा है।

ओडीशा राज्य के प्रत्येक छोटे बड़े शहर में आज, श्री गुरुजी के मार्ग दर्शन एवं प्रेरणा से, श्री शिरडी साईं के अनेकों मंदिर निर्माण हो चुके हैं एवं निर्माणाधीन हैं जो श्री साईंनाथ के श्रद्धा और सबुरी शब्दों का प्रचार कर रहे हैं।

बारीपदा, भंजनगर, कटक, भुबनेश्वर, संबलपुर, पिपीलि, इत्यादि जगह साईं मंदिर निर्माण हो चुके हैं जो कि ओडीशा में साईं धारा प्रवाह का एक मुखरित रूप हैं और भक्तों के लिए , शिरडी साईं के दर्शन का सुलभ मार्ग।

श्री गुरूजी के दिशा निर्देशन में ओडिशा में बने हुए/बनाये जा रहे अनेको शिर्डी साईं मंदिर , लोगों के लिए मानवता एवं एकात्मता के प्रतीक बन, उन्हें आत्मबोध की राह से जोड़ रहे हैं। यक़ीनन, ओडीशा ही नहीं वरन विश्व में श्री शिर्डी साईं के व्यापक विश्व व्यापी प्रसार -प्रचार में श्री गुरूजी का अथक प्रयास एवं समर्पित भावपूर्ण कार्य से समस्त विश्व श्री  शिर्डी साईं के दिव्य  रंग से अभिभूत हो गया है।

श्री गुरुजी के प्रेरणा अनुरूप, उड़िआ भाषा में अनेकों अध्यात्मिक पत्रिकाओं जैसे कि ‘साईं छाया’, ‘साईं वाणी’, ‘साईं निरमाल्य’ आदि प्रकाशित हो रहीं हैं जो कि उड़िया भाषी जन मानस को ,उन्हीं की भाषा में ,श्री साईं से संबंधित सभी जानकारी उपलब्ध कराते हैं व जिनके माध्यम से, भक्त श्री साईं से जुड़े अपने उत्तम विचार, अनुभवों, अध्यात्म संबंधी जिज्ञासाओं के बारे में आदान प्रदान कर सकते हैं। यह पत्रिकाएं अध्यात्म क्षेत्र में ही नहीं, अपितु साहित्यिक रूप में भी , उड़िया भाषा के भक्ति साहित्य को धनी कर रही हैं।

श्री गुरुजी द्वारा रचित १६००० नवाक्षरी छंदों का बृहद्‌ महाकाव्य ग्रंथ, ‘गुरु भागवत्‌’ एक श्रेष्ठ साहित्य भूषण है जो कि सरल भाषा में भक्ति  से जुड़े सभी अध्यात्मिक रहस्यों/आयामों की काव्यात्मक व्याखया है और १४-१५वीं शताब्दी  में रचित श्री जगनाथ दास की भागवत के समकक्ष रचना है।

महाकाव्य ग्रंथ ‘गुरु भागवत्‌’  से ओडीशा के जन मानस में शिरडी साईं के प्रसंग सरल भाषा में घर-घर पहुंचेंगे जिससे कि सद्‌गुरु श्री साईं के मानवता के संदेश को आत्मसात कर एक सुदृढ़ समाज की, नव चेतना युक्त मानव की नींव मजबूत होगी।

श्री गुरुजी द्वारा लिखित बृहद्‌ अध्यात्मिक ग्रंथ ‘गोप्य रू अगोप्य’ (जो उड़िया भाषा में है) अध्यातम के गूढ़तम विषयों पर रोशनी डालता है और प्रत्येक पथिक का मार्ग दर्शन करता है।

शिरडी साईं मंदिर, अध्यात्मिक दृष्टि से ही नहीं ,अपितु सामाजिक रूप में भी , श्री शिरडी साईं के भाईचारे का संदेश जन मानस तक पहुंचाते हैं। पालकी यात्रा में भाग लेने उमड़ता जन सैलाब, समाज को संकीर्णता के दायरे से मुक्त कर , एकता का संदेश देते हैं। लंगर में पंक्तिबद्ध तरीके से एक साथ बैठते भोजन करते भक्त ,अत्मीयता का प्रमाण हैं। शिरडी साईं के अनेकों मंदिर, प्राकृतिक आपादों में (जैसे कि चक्रवाती तूफान/बाढ़) शिविर का आयोजन , अन्य मदद जैसे कि मुफ्त शिक्षा  , साज़ो सामान/राशि इत्यादि की यथासंभव मदद मुहिया कराते हैं, रक्तदान शिविर का आयोजन, मुफ्त चिकित्सा का आयोजन करते हैं जो शिरडी साईं के मानवता का संदेश को हकीकत में अमल करने का प्रयास है।

आज लाखों ओडीशा वासी, शिरडी साईं के मंदिर में शिरडी साईं के दर्शन कर उनसे आशीष ग्रहण कर , धन्य हो, अध्यात्म के मार्ग में चल पड़े हैं, साईं के साथ….

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