श्री गुरूजी के सान्निध्य में बसंत उत्सव २०१२- संगीत , कला द्वारा चेतना विकास एवं ” साईं सन्देश ” ओडिया पुस्तक विमोचन समारोह |
गुडगाँव स्तिथ साईं का आँगन शिडी साईं मंदिर के दसवे वार्षिक उत्सव “बसंत उत्सव-२०१२” में सैकड़ों भक्तों को गुरूजी श्री चन्द्र भानु सत्पथी जी के पावन सान्निध्य में बसंत ऋतू के आगमन पर, बसंत पंचमीको आयोजित भाव पूर्ण समारोह में संगीत-गीत-कला के माध्यम से ईश्वर तत्व को जानने का सुअवसर प्राप्त हुआ |
विगत वर्षों की भांति,बसंत पंचमी की तिथि (२८ जनुअरी २०१२ ) पर आयोजित ” बसंत उत्सव -२०१२” का शुभआरंभ सैकड़ों साईं भक्तों के समक्ष पूज्य गुरूजी श्री चन्द्र भानु सतपथीजी ने श्री शिर्डी साईं बाबा के समक्ष पारंपरिक दीप प्रज्वलित कर, उन्हें नमन कर, अपने कर कमलों से किया | इस शुभ बेला में , गुरूजी श्री चन्द्रभानु सतपथीजी का असमिया पारंपरिक पद्धिति से स्वागत करते हुए असाम शिर्डी साईं मंदिर के सदस्यों श्री टी.य.दास एवं श्री राजीव जोशी ने पूज्य श्री गुरूजी को ”जोरई” ( एक पात्र जिसमे इश्वर के आदर - सम्मान में ताम्बुल -पान , सुपारी अर्पण किया जाता है) और ”गामुछा” अर्पण कर , उन्हें प्रणाम अर्पण किया | वन्दनीय श्री गुरूजी चन्द्र भानु सतपथीजी को आदर सम्मान में पगड़ी पहनाई गयी जो की असाम के विख्यात संत श्री शंकर देव, आदि ( भी) अपने काल में पहना करते थे (श्री शंकर देव - १४६९ में जन्मे-असाम के प्रख्यात वैष्णव संत हैं ; पगड़ी - जो की महापुरुष के अध्यात्मिक आधिपत्य को दर्शाता है ) |
तत्पश्चात , असाम से आए विख्यात ढोल वादक श्री सोमाथ बोरा ओझा ने अपने मधुर ढोल वादन और ताल संग,अपने असमिया गायन शैली में असमिया ”श्री गुरु वंदना” प्रस्तुत कर उपस्तिथ भीड़ को मुग्ध कर दिया | कार्यक्रम में आगे उन्होंने पारंपरिक ढोल, ताल, पप्पा के माध्यम से वायु तरंगो (की) कम्पन से, ब्रह्मपुत्र की घाटी में वेगपूर्ण बहती मदहोश हवा , धीरे-धीरे बरसता बदल , कडकडाती बिजली और पहाड़ों पर निष्ठुरता से बरसती हुई घटा का , सुरीले असमिया गीत के माध्यम से यथार्थ चित्रांकन प्रस्तुत कर सम्पुर्ण परिवेश को मानो ब्रह्मपुत्र के नीले पानी , हरी वादियों, चाय के बागानों में भटकती हवा , घटा के समक्ष ला खड़ा किया |
उपस्तिथ भक्तों की भीड़ को संबोधित करते हुए श्री गुरूजी ने कहा कि प्रत्येक क्षेत्र क़ी संस्कृति, तहजीब में , या भिन्न क्षेत्रों / देशों क़ी संस्कृति- कला, गीत, संगीत, साहित्य से मनुष्य / जन मानस सीख सकता है ; संसार क़ी भिन्न संस्कृति(इयों ) में निहित सुरक्षित जीवन मूल्य गुण को अपनाने, सीखने, आत्मसात करना ही चेतना के बृहद विकास का मार्ग प्रशस्त करता है | श्री गुरूजी ने कहा कि मन सैदव चंचल रहता है और इसको अभ्यास द्वारा हमारे ऋषि नियमित करते रहे हैं | बिहू नाच में प्रदर्शित सुन्दर कलाई क़ी मुद्राएँ गीत, ताल, छंद, लय के सुन्दर भावनात्मक समन्वय का प्रतिक है जो क़ी जीवन शैली /गुण के मूल में स्तिथ उसी मूल सत्ता को प्रलिक्षित करता है | श्री गुरूजी ने कहा कि श्री शिर्डी साईं भी अपने जीवन काल में कला को , गीत को, संगीत आदि को बढ़ावा/ संरक्षण देते थे जैसे कि श्री साईं सत चरित्र में वर्णित प्रसंगों से पता चलता है; तक़रीबन ९२ कलाकार( मंडली) शिर्डी में श्री शिर्डी साईं के जीवन काल के दौरान थे | कला, गीत, संगीत, साहित्य आदि ईश्वर को जानने का माध्यम है –
इसी श्रृंखला को बढ़ाते हुए, साईं का आंगन ने विख्यात कलाकार मसलन श्री बिरजू महराज, श्रीमती शोवना नारायण आदि के संगीत-नृत्य आदि का भाव पूर्ण प्रदर्शन प्रस्तुत कर , ईश्वर को संगीत- नाच-गीत के माध्यम से जनमानस को जानने का सुअवसर प्रदान किया | श्री गुरूजी ने कहा कि यह क्रम जारी रहेगा और शिर्डी साईं द्वारा प्रतिपादित मार्ग देश विदेश में कुकुरमुते भांति फैलता चला रहेगा/ जाएगा |
श्री गुरूजी ने कहा कि उनकी सन १९८९-९० में छपी प्रेस भेंटवार्ता में उन्होंने ने साफ़ चिन्हित किया था कि आने वाले दशकों में श्री शिर्डी साईं के तत्व, विचारों का देश विदेश में व्यापक प्रचार प्रसार होगा जो कि आज पूर्णतया सत्य हो रहा है; आंध्र प्रदेश में ही बड़े छोटे मिलाकार तक़रीबन १००० शिर्डी साईं मंदिर हैं, इसके अलावा सुदूर प्रान्तों से लेकर प्रायः सभी जगह आज शिर्डी साईं के मंदिर आपको मिलेंगे | श्री गुरूजी ने कहा कि यक़ीनन यह एक सद्गुरु कि शक्ति का स्पष्ट प्रारूप है जिसके चलते इतने बेमिसाल तरीके से श्री शिर्डी साईं के सरल सहज जीवन धारा को अपनाने वाले जीवन गुणों / विचारों का देश विदेश में बसे बुद्धिजीवी वर्ग मसलन डॉक्टर, इंजिनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, आदि( इन्हें) अपना रहे हैं और शिर्डी साईं के मंदिर आपको अमरीका , cuba, न्यू ज़ीलैण्ड , कनाडा आदि सभी जगह मिलेंगे | श्री गुरूजी ने कहा कि सरल सहज जीवन शैली कि सीख देने वाले श्री शिर्डी साईं ने अपने जीवन काल में कोई जायदाद , धन , उत्तर अधिकारी आदि नहीं छोड़ा या बनायीं , फिर भी उनके भक्त स्वतः प्रेरित हो उनके मंदिर निर्माण कर रहे है और इन मंदिर के निर्माण में पूंजीवादी प्रशासन सञ्चालन रीति से पूंजी व्यवस्था करने का कोई भी सरोकार नहीं(रहा) है | उन्होंने कहा कि सरल सहज जीवन शैली का पथ सभी धर्मों के सार तत्व में निहित है और इसीलिए श्री शिर्डी साईं के विचार आज भी प्रासंगिक हैं और प्रत्येक मानव इस में जुड़ जाता है और (ये ही) इनके व्यापक प्रचार प्रसार अनुसरण का मार्ग प्रशस्त करता है | श्री गुरूजी ने कहा की श्री शिर्डी साईं सम्बन्धी लोगों के अनुभव सामान्य तार्किक ज्ञान की परिधि से परें हैं –अपने व्यक्तिगत अनुभव के बारें में बताते हुए उन्होंने(श्री गुरूजी चन्द्र भानु सतपथीजी) कहा कि जब वे भारत सरकार के राजनैतिक दर्जे के बतौर अधिकारी स्वरुप cuba में एक प्रतिनिधि मंडल ले कर गएं , तो उन्हें वहां कि वासी श्रीमती मरिओं अंतोनियो पाउलो ,जो कि श्री शिर्डी साईं कीं सन १९६० से भक्त हैं (उन) से मुलाकात हुई — यह मुलाकात अचंभित करने वालीं स्तिथि में हुई और इन महिला को श्री शिर्डी साईं के जीवन आदि के बारें में ज्यादा जानकारी न भी होते हुए वे, श्री शिर्डी साईं भक्त हैं और लोगों का भविष्य देखतीं हैं | चुकिं यह महिला अंग्रेजी अथवा हिन्दी नहीं जानती थीं, फिर भी उन्होंने हिन्दी और अंग्रेजी पत्रिका में छपे शिर्डी साईं के जीवन सम्बन्धी लेख के बारें में खुलासा कियाl | यही नहीं, श्री गुरूजी के चरण कमलों को पारंपरिक हिन्दू विधि से गुरु परंपरा अनुसार धो और तत्पश्चात श्री गुरूजी के चरण कमलों का पूजन किया | क्या यह संभव है कि एक शख्स जो संस्कृति, देश , काल, फासलें सभी मायनों में हमसे भिन्न है, गुरु परंपरा को जाने बिना ही किसी अनजान व्यक्ति के चरण कमलों का पूजन करें ? यह सद्गुरु क़ी दिव्य अलौकिक गुण का परिणाम है जो क़ी आज विश्व के समस्त कोनों में फैलता जा रहा है |
इस अवसर पर श्री सुरेश पंडा द्वारा लिखित ” साईं सन्देश” नामक ओडिया पुस्तक का विमोचन श्री गुरूजी ने अपने कर कमलों से किया |
कार्यक्रम में असाम से आए श्री सोमनाथ बोरा ओझा – विख्यात (समिलित शिल्पी गोष्टी के )असमिया ढोल वादक गुरु - ने अपने मंडली(२० नर्तक एवं नर्तकियों ) के साथ भाव पूर्ण बिहू नृत्य में ब्रह्मपुत्र की नीली पहाड़ियों में , लहलहाते चाय के बागों से सटी धान की फसल के बीच रचे- बसे जीवन और जीवन प्रेम गीत को संगीत , नृत्य में ढ़ालते और चित्रांकन करते हुए असमिया गीत को बखूबी प्रस्तुत किया और दर्शकों का मन मोह लिया | ढोल के टापों पे थिरकते पप्पा के गूंज-स्वर और असमिया गीत सुर पर न्रित्यांग्नाओं के सुन्दर कलाई मुद्राएं ने मानो जीवन प्रेम की मधुर तलाश और अभिलाषा को सजीव कर दिया | असमिया बिहू गीत के मधुर बोल ( धान के खलिहान के बीच अकेले में अपने को पाकर , हिरामायी ( एक लड़की) को , उस की मधुर यादों को हर तितली में, उड़ते हुए पक्षी में, उसके घर के ओर जाते हुए रस्ते के दोनों ओर लगे जाई, मालती औए अन्य पुष्प लतिकाओं में , कोयल की गूँज में खोजती है …) पर पावन पवन सी भावपूर्ण हस्त मुद्राएं , मुखरित भाव, लयबद्ध थिरकते पाँव, बासुरी की (हिरामायी की ) मधुर (खोज) पुकार , ढोल के ताल पर पप्पा के घाटियों में गूंज और असाम के स्वर गीत ने बिहू नृत्य की पुकार से ह्रदय को रोमांचित कर दिया | श्री गुरूजी ने असाम के बिहू गीत -नृत्य मंडली पर उनके शानदार नृत्य-गीत प्रस्तुति पर अपना सस्नेह और आशीष की कृपा बरसा दी |
साईं का आंगन के भक्त कलाकारों ने श्री शिर्डी साईं के जीवन काल से सम्बंधित जीवन प्रसंग ( श्री साईं का शिर्डी में भिक्षा प्रसंग ) का श्रीमती मंगला द्वारा सुरबद्ध गीत पर भाव पूर्ण मराठी शैली में नृत्य प्रस्तुत किया जिसे दर्शकों ने सराहा |.
कार्यक्रम का मंच सञ्चालन श्रीमती ज्योत्स्ना ने बखूबी किया | कार्यक्रम के अंत में उपस्तिथ जन समुदाय ने श्री गुरूजी से आशीष ग्रहण किया | उपस्तिथ दर्शकों की भीड़ सविनय प्रसाद सेवन के लिए आमंत्रित थें | (इस) कार्यक्रम का सीधा प्रसारण इन्टरनेट के माध्यम से विश्व के समस्त साईं भक्तों के लिए किया गया |
श्री शिर्डी साईंबाबा |
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श्री गुरूजी |
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श्री शिर्डी साईं पीठ,बारीपदा |
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श्री शिरडी साईं बाबा – एक फकीर, जो कि अहमदनगर जिले के शिरडी नामक एक छोटे से गांव में अवत्तीर्ण हुए ,शिरडी साईं बाबा के पैतृक
श्री चंद्रभानु सतपथीजी स्वयं को श्री शिरडी साईं का महज एक चाकर मानते हैं - वे शिरडी साईंबाबा के द्वारा सिखाए गये मानवता
१४ अप्रैल २००१ के दिन पूजनीय गुरुजी ने, बारीपदा (उड़ीसा) में , श्री शिरडी साईं पीठ मंदिर का उद्घाटन किया। इससे पहले,