“ओडिशा रत्न अवार्ड” से पूजनीय गुरूजी विभूषित |
नई दिली में १० नवम्बर २०११ की कार्तिक पूर्णिमा के चाँद की सुहावनी पावन किरणों से हर्षित सितारों भरी रात्रि में , भारत के सर्वोच्च न्यालय के न्यायमूर्ति श्री अनंग कुमार पटनाइक महोदय ने पूजनीय गुरूजी श्री चन्द्र भानु सतपथीजी को उनके सामाजिक विकास , कला, साहित्य , संगीत , लोकोपकारी आदि क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट योगदान और भूमिका की सराहना में ” ओडिशा रत्न अवार्ड ” से दर्शकों के करतल ध्वनी के बीच विभूषित किया ; न्यायमूर्ति श्री अनंग कुमार पटनाइक महोदय से सम्मान ग्रहण करते हुए पूजनीय गुरूजी श्री चन्द्र भानु सतपथीजी का दर्शकों ने खड़े होकर करतल गूंज से सहर्ष अभिनन्दन किया | श्री गुरूजी को सम्मानित करते हुए न्यायमूर्ति श्री अनंग कुमार पटनाइक महोदय ने उन्हें प्रशस्ति पत्र एवं शाल भेंट की | तदोपरांत उन्हें पुष्प गुच्छ से सम्मानित किया गया |
ओडिशा का पर्व “बोइतो बन्दानो” के शुभ अवसर पर , “उड़िआ पु” एवं ओडिआ समाज सहयोग से आयोजित “नवम बोइतो बन्दानो उत्सव २०११” की इस पावन रात्रि में उपस्तिथ लोगों की भीड़ का अभिनन्दन स्वीकारते हुए, पूज्य गुरूजी श्री चन्द्र भानु सतपथीजी ने कहा कि ओडिशा कई क्षेत्रों में अपनी उत्कृष्टता के लिए मशहूर है जैसे कि फिलिग्री, मूर्ति – कला, आदि | संचार -प्रसार के इस युग में, हमें ओडिशा के प्रगति एवं व्यापक उन्नति के लिए इन उत्कृष्ट आयामों का व्यापक प्रचार -प्रसार करना होगा; जो कि आज तुल्नात्माक तौर पर यदि हम देखें तो आज किया जा रहा यह प्रचार बहुत हद्द तक अपूर्ण एवं कम है |
पूजनीय गुरूजी श्री चन्द्र भानु सतपथीजी ने कहा कि आप देखेंगे कि (सभी ) सभ्यता के विकास का एक काल चक्र होता है ; ओडिशा के विकास का काल चक्र का आरंभ २०१२ से होगा एवं आप पाएंगे कि सन २०३० तक ओडिशा उन्नतशील, प्रगति पूर्ण रूप में उभरेगा | इस प्रगति के बीज श्री जगन्नाथ कि इस (ओडिशा ) भूमि में हैं ; काल चक्र के फूलने-फलने के समय कुछ वेदना हो सकती है परन्तु नियति द्वारा निर्धारित उन्नति के इस काल चक्र की यह सीमा रेखा तय जानिए, जो कि आप सभी देखेंगे| श्री गुरूजी ने कही कि प्रत्येक ओडिशा वासी जन्म से ही प्रभु श्री जगन्नाथ का भक्त होता है | शिर्डी साईं को मानने का अर्थ अपने इष्ट देव को भूलना/ छोड़ना कादापि नहीं है | स्वयं शिर्डी साईं ने शिव की पूजा करने वाले भक्त को प्रथमतः शिव की आराधना करने के लिए कहा| महा प्रभु श्री जगन्नाथ श्री कृष्ण के समतुल्य नहीं हैं ; श्री जगन्नाथ श्री विष्णु या फिर इतर देवता आदि के समतुल्य भी नहीं हैं | श्री जगन्नाथ जिन्हें “दारू ब्रह्म” भी कहा जाता है, इन सभी तत्वों (पथ) से परे हैं क्यूंकि श्री जगन्नाथ में इन सभी तत्वों (पथों / मतों / इष्टों आदि ) का समावेश है और वे आपके अन्तर्हित में निहित निज के भी निज स्वरुप , तत्व का स्वरुप हैं जिसका उदय और विस्तार , निज स्वरुप के भान में स्तिथ है| श्री गुरूजी ने कहा की आने वाले समय में ओडिशा प्रसिद्धी पाएगा| श्री गुरूजी ने इस अनुष्ठान के आयोजकों एवं उपस्थित समुदाय को धन्यवाद दिया |
रंगारंग कार्यक्रम में दर्शकों को ओडिशा के मयूरभंज जिले में स्तिथ बारीपदा के लुभावने “छऊ नृत्य शैली” का भी प्रदर्शन देखने का सुअवसर प्राप्त हुआ | बारीपदा के छऊ नर्तकों ने गुरुकुल में (युद्ध सम्बन्धी ) शिक्षा प्राप्त करते हुए शिष्यों की गुरु द्वारा समीक्षा- जांच प्रसंग को दर्शाते हुए बेहद भाव पूर्ण छऊ नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों से प्रशंसा प्राप्त की | आयजोकों ने इस मौके पर उपस्तिथ जन समूह को बताया कि चूँकि छऊ नृत्य बारीपदा से ही जुड़ा- रचा बसा है व् बारीपदा के समाज- कला का प्रारूप है इसलिए बारीपदा में ही ” छऊ नृत्य अकादमी ” खोलने के लिए कला मंत्रालय को ज्ञापन दिया जाएगा | कार्यक्रम के आरंभ में उपस्तिथ समुदाय हेतुआर्थ आयजोकों ने पूजनीय गुरूजी के सामाजिक, अध्यात्मिक,कला,संगीत,मानवता परोपकारआदि सम्बन्धी कार्यक्षेत्र सम्बन्धी विस्तृत जानकारी प्रदान की | इस समारोह में आयजोकों ने ओडिआ समाज के अन्य सदस्यों को भी समान्नित किया गया |
श्री शिर्डी साईंबाबा |
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श्री गुरूजी |
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श्री शिर्डी साईं पीठ,बारीपदा |
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श्री शिरडी साईं बाबा – एक फकीर, जो कि अहमदनगर जिले के शिरडी नामक एक छोटे से गांव में अवत्तीर्ण हुए ,शिरडी साईं बाबा के पैतृक
श्री चंद्रभानु सतपथीजी स्वयं को श्री शिरडी साईं का महज एक चाकर मानते हैं - वे शिरडी साईंबाबा के द्वारा सिखाए गये मानवता
१४ अप्रैल २००१ के दिन पूजनीय गुरुजी ने, बारीपदा (उड़ीसा) में , श्री शिरडी साईं पीठ मंदिर का उद्घाटन किया। इससे पहले,