“श्री गुरु भाग्वत (प्रथम-स्कन्द)” ग्रन्थ के अंग्रेजी अनुबाद का विमोचन समारोह |
समग्र विश्व के अध्यात्मिक पथिकों के मार्गदर्शन व् कल्याण के लिए ओडिया भाषा में रचित अमूल्य अध्यात्मिक निधि ” श्री गुरु भाग्वत “ ग्रन्थ (प्रथम-स्कन्द) का अंग्रेजी रूपांतरण पुस्तक का अनावरण पूज्य गुरूजी श्री चन्द्र भानु सतपथीजी ने २९ दिसम्बर २०११ को गुडगाँव स्तिथ साईं का आंगन मंदिर में आयोजित भव्य समारोह में असंख्य साईं भक्तों के हर्ष उल्हास एवं करतल ध्वनि के बीच कर, प्राचीन ऋषि मनीषों द्वारा प्रतिपादित “गुरु तत्व” के मार्ग की अविरल असीम श्रंखला को जनसामान्य तक सहज सामान्य अबाधित रूप में प्रस्तुत किया ।” गुरु पथ ” के महत्वपूर्ण आधार स्तंभों मसलन सद्गुरु / भिन्न श्रेणी के गुरु में भेद, शिष्य के प्रकार, गुरु- शिष्य परंपरा, भक्ति - सुभक्त, कुभक्त, अंकित संतान इतियादी गूढ़ विषयों पर सद्गुरु श्री चंद्रभानु सतपथीजी के वास्तविक गुणातीत -प्रत्यक्ष अनुभव पर आधारित ” श्री गुरु भाग्वत (प्रथम-स्कन्द) “ ग्रन्थ सचे पथिकों का आदर्श स्तम्भ स्वरुप व् साक्षात् श्री गुरु प्रारूप हैं ।
समारोह की शुरुआत पूज्य गुरूजी श्री चन्द्र भानु सतपथीजी ने श्री साईं नाथ महराज समक्ष नतमस्तक हो आशीष ग्रहण कर , तदोपरांत पारंपरिक दीप प्रज्वलित कर विधिवत किया ।
श्री गुरूजी चन्द्र भानु सतपथीजी द्वारा रचित ” श्री गुरु भाग्वत “ ग्रन्थ की मूल ओडिया कृति में , ओडिया भाषा के नवाक्षरी छंद में बद्ध १६००० पंक्तियाँ हैं – मायने कि ८००० छंद हैं और प्रत्येक छंद में नव वर्ण हैं जो कि १५ शताब्दी में ओधिषा के पञ्च सखा युग के श्री जगन्नाथ दास द्वारा रचित “भागवत” के समकक्ष हैं । यक़ीनन, विश्व में पिछले ३००-४०० सालों में किसी भी भाषा -साहित्य के इतिहास में ” श्री गुरु भाग्वत ” ग्रन्थ स्वरुप अनुपम साहित्य निधि की संरचना का वर्णन नहीं मिलता । बहुत काल से अनेकों भक्तों ने श्री गुरूजी से मूल ओडिया ग्रन्थ के अंग्रेजी तर्जुमें बाबत निवेदन किया व् भक्तों / पथिकों की “गुरु तत्व ” (जिसका सम्बन्ध श्री शिर्डी साईं नाथ व् श्री साईं सत्चरित्र में वर्णित है ) सम्बन्धी ज्ञान प्राप्त करने की इच्छा को पूर्ण करते हुए श्री गुरूजी ने स्वतः अपनी मौलिक ओडिया कृति का अंग्रेजी अनुवाद किया है ; विश्व के अंग्रेजी भाषा जानने वाले वर्ग समूह के लिएअंग्रेजी अनुवाद लाभदायी साबित होगा।
श्री गुरूजी चन्द्र भानु सतपथीजी ने इस ख़ुशी के मौके पर अपने संबोधन में कहा कि “श्री गुरु भागवत ” गुरु तत्व से सम्बंधित है जो असीम अनंत है एवं ” गुरु तत्व “ समय काल की गति/बाधा से मुक्त , स्वछंद अविरल रूप से सर्व विद्यमान है ; ”गुरु तत्व” सद-चिदा-आनंद स्वरुप (आत्मा ) (व् ) ब्रह्माण्ड(विश्वात्मा) में व्याप्त है । अध्यातम का तात्पर्य इसी सत्य से है और सत्य को ग्रहण कर निभाना अध्यात्म का सार है , इसलिए ”श्री गुरु भागवत ” प्रत्येक धर्म/ मतों के पथिकों के लिए है । विश्व के भिन्न मतों / पथों के गुरुओं का “श्री गुरु भागवत” में ज़िक्र है और सभी मार्गों के सार को ”श्री गुरु भागवत ” में आप पाएंगे। श्री गुरूजी ने कहा कि पुराणों में इसका सांकेतिक विवरण अर्धनारिश्वर रूप से दर्शाया गया है –जैसे कि प्रभु शिव को (सद चिदा आनंद स्तिथि में आरूढ़ हो , शक्ति द्वारा सृष्टि कि उत्पति, रक्षा व् क्षय को सम रूप से धारण करना ) । शिर्डी साईं क़ी शिर्डी स्तिथ मूर्ति भी इसी रूप को दर्शाती है जो कि उनके परम सद्गुरु का लक्षण है ।
श्री गुरूजी ने कहा कि “श्री गुरु भागवत” एक कोष है जो भक्ति, ज्ञान के मार्ग के भिन्न आयामों को, जिसका सम्बन्ध ”गुरु तत्व” से है — जिसे शिर्डी साईं नाथ महाराज ने अपने सरल सहज तरीके से समझाया , सद्गुरु श्री रामकृष्ण परमहंस ने, अनेको सदगुरुओं ने इसी पथ पर आरूढ़ हो , अपने भक्तों को उनकी माँ बन , भक्तों क़ी ऊँगली पकड़ कर अध्यात्मिक उन्नति का मार्ग दिखाया। इसीलिए सदगुरुओं को “माँउली” (यानि माँ) शब्द से संबोधित किया जाता है । सद्गुरु यानि “माँ” जो अपने अंकित संतानों के प्रत्येक पाप-पुण्य का भार स्वतः वाहन कर ,अपने अंकित संतानों को , सही मायनों में अध्यात्मिक उतथान तक ले जाते हैं । श्री गुरूजी ने कहा कि इस आश्वासन से बढ़ी निधि क्या हो सकती है! क्या यह कम अद्भुत है क़ि श्री शिर्डी साईं के जीवन काल में उनसे जुड़े उनकी अंकित संताने मसलन शामा , कोलिते पाटिल इतियादी जो कि मूलतः ग्रामीण , अत्यंत साधारण परिपेक्ष में जन्मे थे , आज उन अंकित संतानों को विश्व के कोने -कोने में सभी जानते हैं और उनका विवरण “श्री साईं सत चरित्र” में भी आप पढ़ते हैं। श्री गुरूजी ने कहा कि उनकी लेखनी “श्री गुरु भागवत ” की सार्थकता अध्यात्मिक मार्ग के पथिक/ भक्त को इस पुस्तक से मिले मार्गदर्शन में निहित है ।श्री गुरूजी ने भक्तों को सीमित जीवन के प्रत्येक क्षण प्रति सजग रहने की सलाह दी ।
श्री गुरूजी चन्द्र भानु सतपथीजी ने उपस्तिथ समुदाय को बताया क़ि “श्री गुरु भागवत ” क़ि रचना करते वक्त उनके अंतःकरण से स्फुरित विचार स्वतः ही नवाक्षरी छंद में उभरे । और इन छंद की रचनाओं के लिए उन्होंने कोर्इ पूर्व-विषय नहीं सोचा था – जैसे-जैसे भाव उभरे , विचार आते गए, वे (यानि श्री गुरूजी ) उन्हें लिखते गए जो क़ि वे प्रायः रात्री ११ बजे से प्रातः ४ बजे तक (वे )लेखनी बद्ध करते। मूल कृति तक़रीबन ८ वर्ष के अवधि में लिखी गयी ; इस कृति की संरचना करते हुए इस कृति को प्रकाशित करने का कोई ख्याल नहीं था । निकट मित्रों ने इन छंदों को सुना और इन्हें प्रकाशित करने का सुझाव दिया । लिखते वक़्त यह कृति १५००-१६०० पृष्ठों में थी और काफी हद तक अनियोजित थी ; मूल कृति को शीर्षक -उपशीर्षक विषय अंतर्गत तैयार करने, प्रारूप देने में , क्रमिक रूप तैयार आदि कार्यों में और पुस्तक के पृष्ठ -मसोदे को सँवारने में, टंकण में श्री गुरूजी के भतीजे श्री देबब्रत सतपथी ने सहयोग दिया एवं विजनस पबलिशेरस , भुबनेशवर ने इस अमूल्य कृति को प्रकाशित किया। श्री गुरूजी ने इस कार्य के लिए उन्हें धन्यवाद दिया व् अनुष्ठान के अयाजोको और उपस्तिथ भक्तों को धन्यवाद दिया।
इस मौके पर “श्री गुरु भागवत” के छंद ११,१४,१५ में वर्णित सद-चिदा-आनंद में स्तिथ (-प्रज्ञ) श्री गुरु के छवि को दर्शाते हुए और ग्रन्थ के छंद ४६३,४६५,४६४ में वर्णित सद्गुरु की (अंकित ) संतानों के माया मोह भवंर से बाहर निकल आने पर , गुरु भाव - प्रज्ञा में स्थापित होने का भाव पूर्ण ओडिसी नृत्य भक्तों के समक्ष श्रीमती मधुस्मिता दास एवं श्री भागीरथ ने प्रस्तुत किया । श्रीमती सुधा मिश्रा (स्टेशन डिरेक्टर,AIR , कटक ) और श्री मोहपात्रा (प्रसिद्ध ओधिषा फिल्म पार्श्व गायक ) द्वारा “श्री गुरु भागवत” के इन छंदों के भावपूर्ण गायन पर आधारित श्रीमती मधुस्मिता दास ( ओडिसी नृत्य गुरु) एवं श्री भागीरथ ( ओडिसी नृत्य गुरु)द्वारा भावपूर्ण ओडिसी नृत्य ने भक्तों को भाव-विभोर कर दिया। श्रीमती ज्योत्स्ना ने बखूबी सूत्रधार की भूमिका निभायीं । भारत के भिन्न प्रदेशों में स्तिथ साईं मंदिर के संचालक , trustees , अतिथि इस अवसर पर उपस्तिथ थे । अनुष्ठान की इन्टरनेट के माध्यम से सीधा प्रसारण विश्व के समस्त गुरु बंधुओं के लाभार्थ हेतु किया गया।
इस मधुर शाम की सुनहरे पलों की कुछ तस्वीरें , आपके लिए…
श्री शिर्डी साईंबाबा |
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श्री गुरूजी |
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श्री शिर्डी साईं पीठ,बारीपदा |
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श्री शिरडी साईं बाबा – एक फकीर, जो कि अहमदनगर जिले के शिरडी नामक एक छोटे से गांव में अवत्तीर्ण हुए ,शिरडी साईं बाबा के पैतृक
श्री चंद्रभानु सतपथीजी स्वयं को श्री शिरडी साईं का महज एक चाकर मानते हैं - वे शिरडी साईंबाबा के द्वारा सिखाए गये मानवता
१४ अप्रैल २००१ के दिन पूजनीय गुरुजी ने, बारीपदा (उड़ीसा) में , श्री शिरडी साईं पीठ मंदिर का उद्घाटन किया। इससे पहले,