Connect us on YouTube Connect us on FACEBOOK Subscribe RSS      || जय श्री साईं ||
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श्री साईं वचनामृत

”तुम चाहे कहीं भी रहो, जो इच्छा हो सो करो, परंतु यह सदैव स्मरण रखो कि जो कुछ तुम करते हो, वह सब मुझे ज्ञात है। मैं ही समस्त प्राणियों का प्रभु और घट-घट में व्याप्त हूँ। मेरे ही उदर में समस्त जग और चेतन प्राणी समाये हुए हैं। मैं ही समस्त ब्रह्‌माण्ड का नियंत्रण कर्त्ता व संचालक हूँ। मैं ही उत्पत्ति, स्थिति व संघर्षकर्ता हूँ। मेरी भक्ति करने वालों को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता। मेरे ध्यान की उपेक्षा करनेवाला, माया के पाश में फंस जाता है। समस्त जंतु, चिड़ियाँ तथा दृष्टिमान, परिवर्तन और सभी विश्व मेरे ही स्वरूप हैं….” (साईं का कहना है)

”जो प्रेम पूर्वक मेरा नाम स्मरण करेगा, मैं उसकी समस्त इच्छाएं पूर्ण कर दूंगा। उसकी भक्ति में उत्तरोत्तर वृद्धि होगी। जो मेरे चरित्र और कृतियों का श्रद्धापूर्वक ज्ञान करेगा, उसकी मैं हर प्रकार से सदैव सहायता करूंगा। जो भक्तगण हृदय और प्राणों से मुझे चाहते हैं, उन्हें मेरी कथाएं श्रवण कर स्वभावतः प्रसन्नता होगी। विश्वास करो कि जो कोई भी मेरी कथाओ का कीर्तन करेगा, उसे परमानंद और चिरसंतोष की उपलब्धि हो जायेगी। यह मेरी विशेषता है कि जो कोई भी अनन्य भाव से मेरी शरण में आता है, जो श्रद्धापूर्वक मेरा पूजन, निरंतर स्मरण और मेरा ही ध्यान किया करता है, उसको मैं मुक्ति प्रदान कर देता हूं। जो नित्य प्रति मेरा नाम स्मरण और पूजा  कर मेरी कथाओं और लीलाओं का प्रेमपूर्वक मनन करते हैं, ऐसे भक्तों में सांसारिक वासनाएं कैसे ठहर सकती हैं? मैं उन्हें मृत्यु के मुख से बचा लेता हूं। मेरी कथाएं श्रवण करने से मुक्ति हो जायेगी। अतः मेरी कथाओं को श्रद्धापूर्वक सुनो, मनन करो, सत्य और संतोष प्राप्ति का सरल मार्ग ही यही है। इससे श्रोताओं के चित्त को शांति प्राप्त होगी और जब ध्यान प्रगाढ़ और विश्वास दृढ़ हो जायेगा, तब अखंड चैतन्यघन से अभिन्नता प्राप्त हो जायेगी। केवल ‘साईं’ के उच्चारण मात्र से ही उनके समस्त पाप नष्ट हो जायंगे….” (साईं का कहना है)

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