बाबा के दर्शन तत्त्व |
शिरडी साईं बाबा अक्सर कहते कि उनमें अपने भक्तों की समस्त जरूरतों/मांगों को प्रदान करने का सामर्थ्य/शक्ति है।
शिरडी साई बाबा ने कभी भी कर्मकांड का पक्ष नहीं लिया, वे किसी भी दस्तूरों की नियमावली को नहीं मानते थे और उनके विचार में सहज सादगी में पल्लवित प्रफुलित मानवता, सभी धर्मों की एकात्मता (जो कि संकीर्ण मानसिक उपज की सभी बेढ़ियों पर कटाक्ष करती हुई) संपूर्ण विश्व को एक लय में समन्वय करने हेतु, महज दो महत्वपूर्ण आधार स्तंभ ”श्रद्धा” और ”सबुरी” में परिलक्षित थी।
सादगी : भौतिक स्तर पर यदि हम देखें तो ज्ञात होगा कि शिरडी साईं बाबा की दैनंदिन जीवन शैली सादगी भरे जीवन का जीता जागता प्रारूप था – उनकी पोशाक जो कि महज एक फटी पुरानी कफनी थी, एक टोपीनुमा वस्त्र और एक भिक्षा पात्र – यह थी उनकी समस्त भौतिक जीवनकाल की मूल आवश्यकताएं। भिक्षा/दान/भेंट में प्राप्त हुए वस्तुओं के प्रति उनकी अरुचि इस तथ्य से पता चलती है कि सुबह दान/भिक्षा इत्यादि से प्राप्त हुई संपूर्ण वस्तुएं उसी दिन की शाम तक, अन्य सूफी संतों की भांति, भक्तों/जरूरतमंदों में वे वितरित कर देते थे। सभी प्राणियों के प्रति उनकी चिंता, स्नेहभाव और उनका समस्त प्राणियों को अपने आत्मा का अंश मानना, जो कि मानवता का मूल सिद्धांत है, उनके सादगीपूर्ण जीवन के पहलु हैं।
अध्यात्मिक पटल पर ‘सादगी’ का अर्थ अपने मूल स्त्रोत को पाना है, घर पहुँचना है माने आत्मिक दर्शन। इस उद्देश्य से सादी कोई भी और वस्तु नहीं हो सकती जो कि हर मानव का जन्मसिद्ध अधिकार है। शिरडी साईं यद्यपि भौतिक क्रियाओं में लिप्त प्रतीत होते, तथापि वे आत्मिक दर्शन/स्थिति में लीन रहते थे – केवल यही श्रेष्ठतम सादगीपूर्ण जीवन शैली की कला है।
मानवता : शिरडी साईं समस्त विश्व के प्राणियों के भौतिक एवं अध्यात्मिक उत्थान के प्रति सजग थे । उनका दैनिक आचरण जिसके तहत / चलते वे सभी प्राणियों को – जाति, धर्म, वर्ग, भाषा और मानव द्वारा निर्मित अन्य सभी संकीर्ण दायरों से उपर उठते हुए – सभी मनुष्यों को अपना मानते, वे सभी प्राणी में अंतर्निहित दिव्यात्मा में विश्वास रखते थे और सदैव उनके विकास, सुख के प्रति सजग, चिंतित रहते। उनके जीवन काल के दौरान, शिरडी में उनसे मिलने, समाज के समस्त वर्ग, जाति, धर्म, श्रेणी, भाषा इत्यादि के लोग आते। वे अपने सभी भेंट/मिलने वालों की आवभगत् स्नेह करुणामय आनंदमय होकर करते। शिरडी साई सबकी मां/जननी थे।
अध्यात्मिक पटल पर ‘मानवता’ का मूल सिद्धांत हर मानव मात्र को / प्राणी को/ जीवात्मा को अपना मानना है (अपनी आत्मा का प्रतिबिंब मानना है)। दूसरे प्राणी की सेवा ही ईश्वर की सेवा है भी इसी मत का प्रतिपादन करती है (नर सेवा, नारायण सेवा)।
सब का मालिक एक : शिरडी साईं बाबा ने, संकीर्ण मानसिकता से उपजे हुए वर्ग, जाति, धर्म, श्रेणी, भाषा इत्यादि की दीवारों के आधार पर, कभी भी भेदभाव नहीं किया। उन्होंने सभी व्यक्तियों को उनके व्यक्तिगत मत/धर्म अनुसार पथ प्रदर्शन किया, यद्यपि वे सदैव श्रद्धा और सबुरी को आत्मसात करने पर बल देते। निरपेक्ष अध्यात्मिक जीवन शैली की इस राह के सिर्फ दो आधारस्तंभ थे – श्रद्धा और सबुरी – जो कि दैनंदिन जीवन शैली के प्रत्येक आयाम/पहलु को, पवित्र आचरण से निर्वाह करते हुए प्राप्त किये जा सकते हैं व जो समस्त विश्व के सुखद सुचारु सामंजस्य के लिए हितकारक हैं।
अध्यात्मिक पटल पर ”सब का मालिक एक” का अर्थ मूल प्रारूप को प्राप्त करना है जो कि सर्वत्र, सर्वस्व, निरंतर, चिर प्राचीन निराकार ‘एक’ है।
श्रद्धा : शिरडी साईं प्रायः अपने भक्तों को श्रद्धा रखने के लिए कहते ताकि वे (यानि की भक्तगण) अपने जीवन में होने वाली समस्त (सुखद एवं दुखद) बदलावों को शांति से ग्रहण कर सकें। लौकिक दृष्टि से देखें , तो हम यहाँ महसूस करेंगे कि यदि श्रद्धा रूपी गुण आत्मसात हो जाये तो हम किसी भी परिस्थिति में, किसी से भी राग द्वेष की भावना नहीं रखेंगे, जो की हमारे अध्यात्मिक पथ पर अग्रसर होने में सहायक सिद्ध होंगी।
अध्यात्मिक दृष्टिकोण से देखें तो श्रद्धा का सही अर्थ पूर्ण समपर्ण की भावना से लिप्त, पवित्र आचरण एवं जीवन शैली का निर्वाह करते हुए, अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर/प्रयासरत रहना है – लक्ष्य है चेतना का जागरण और संपूर्ण विकास। मार्ग में आने वाली सभी मायावी एवं अमायावी शक्तियों के प्रभावों को ठुकराते हुए, पथिक को आगे बढ़ना है।
सबुरी : अन्य संतों की भांति, शिरडी साईं बाबा ने समस्त मानव जाति को, जीवन के प्रत्येक क्षण में, धैर्य/सहनशीलता अपनाने का मार्ग दिखाया। लौकिक स्तर पर, धैर्य/सहनशीलता का गुण, समाज में सामंजस्य, मित्रता की स्थिति उत्पन्न करता है क्योंकि हर प्राणी जीवन के कठिन से कठिन क्षणों में भी बिना उत्तेजित हुए, पवित्र एवं उचित आचरण के माध्यम से जीवन निर्वाह करता है।
अध्यात्मिक स्तर पर सबुरी का अर्थ सभी इंद्रियों को शांत कर, विचारों- चित्त को शांत कर, खुद को खोजना है – सद्चिदानंद को पाना है।
यह कहा जा सकता है कि शिरडी साईं बाबा की समस्त शिक्षा का सार/निचोर अपने समस्त कार्य क्षेत्र में/क्रिया कलापों में उचित पवित्र आचरण युक्त जीवन शैली का निर्वाह है, जो कि शिरडी साईं ‘श्रद्धा’ और ‘सबुरी’ के रूप में प्रतिबिंबित करते ।इन दोनों मूल्यों को ग्रहण करने से समाज और समस्त विश्व एक संपूर्ण सामंजस्य युक्त इकाई बन पायेगी, जिसमें हर प्राणी एक दूसरे की मदद करेगा व मैत्री भाव रखेगा।
श्री शिर्डी साईंबाबा |
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श्री गुरूजी |
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श्री शिर्डी साईं पीठ,बारीपदा |
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श्री शिरडी साईं बाबा – एक फकीर, जो कि अहमदनगर जिले के शिरडी नामक एक छोटे से गांव में अवत्तीर्ण हुए ,शिरडी साईं बाबा के पैतृक
श्री चंद्रभानु सतपथीजी स्वयं को श्री शिरडी साईं का महज एक चाकर मानते हैं - वे शिरडी साईंबाबा के द्वारा सिखाए गये मानवता
१४ अप्रैल २००१ के दिन पूजनीय गुरुजी ने, बारीपदा (उड़ीसा) में , श्री शिरडी साईं पीठ मंदिर का उद्घाटन किया। इससे पहले,