Connect us on YouTube Connect us on FACEBOOK Subscribe RSS      || जय श्री साईं ||
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बाबा का पथ

आपको श्रीमद्‌भागवतगीता का वह श्लोक स्मरण होगा जो श्री कृष्ण ने महाभारत युद्ध में पार्थ अर्जुन से कहा था :

यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारतः
अभ्युत्थानम अधर्मस्य तदात्मानम स्रजाम्यहम

अर्थ : जब भी धरती पर बदी/दुष्टता/पाप/अधर्म की वृद्धि होती है, तो ईश्वर स्वयं इस पृथ्वी पर धर्म की मर्यादा को (नैतिकता) स्थापित करने के लिये आर्विभाव करते हैं, जिससे धर्म की अधर्म पर विजय हो। ईश्वर का मुख्य  कार्य दुष्टों को दण्ड देना है।

परन्तु, सद्‌गुरु का या कुतुब का पृथ्वी पर अवत्तीर्ण होने का मुख्य  ध्येय पृथक है। सद्‌गुरु या कुतुब कभी भी दण्ड देने की बजाए भक्तों को , प्राणियों को ऐसे अनुभव देते हैं जो प्राणी की चेतना को शुद्ध करते हुए उन्हें धर्म के मार्ग, ईश्वर का सामीप्य  पाने के मार्ग को अपनाने के लिए प्रेरित करता है ताकि वे दुष्कर्मों/अधर्म से बचें। आप यह कह सकते हैं कि ईश्वर और सद्‌गुरु के बीच यह एक विशेष भिन्नता है जो मानव के लिये लाभकारी है। सद्‌गुरु एक कल्पवृक्ष समान हैं जो सभी को फल के अतिरिक्त संरक्षण/आश्रय भी देते हैं।

श्री साईं बाबा का मुख्य  ध्येय मानव को उसमें अंतर्निहित दिव्यात्मा के प्रारूप से मिलाना है। वे मनुष्य को माया और भ्रम से मुक्त कर मोक्ष देना चाहते हैं। वे प्राचीनतम युग से मानव को आश्वस्त कर रहे हैं कि, प्रताड़ित, काल चक्र में कई जन्मों से बद्ध जीवात्मा  जो दुनियाई मायाजाल में दुखी है , उनके वे पालानहार व संकटनाशक हैं। उनका पवित्र उद्‌देश्य अपने बच्चों का पुर्नउत्थान, चेतना विकास व धैर्य देना है। यह सब बाबा के गोचर कार्यकलाप हैं। इन सब कार्यों के अलावा, बाबा का समस्त ब्रह्‌माण्ड के प्रशासन संचालन में – इस ब्रह्‌माण्ड के सृजन, पोषण और विलय में – एक महत्‌ भूमिका है। शिरडी साईं सभी जीव में ईश्वर को देखते थे। सृजनहार (परमात्मा) से प्राणी को मिलवाना/जोड़ना (जीवात्मा) – मतलब कि मनुष्य को उसके दिव्य ईश्वरीय रूप से अवगत कराना ही उनका कर्तव्य है। (गुरुजी श्री सी.बी. सतपथीजी)।

क्या यह अद्‌भुत नहीं कि शिरडी साईं के भौतिक निर्वाण के पश्चात्‌ भी, आज लगातार बढ़ती हुई संखया में जन मानस इन महान सामर्थ्यवान संत की चमत्कारिक अनुकंपा का अनुभव अपने दैनंदिन जीवन काल में प्राप्त कर, अनुग्रहित हो रहे हैं और शिरडी साईं का वही चिर परिचित सबल सामर्थयवान आशावान का ढाढस इस जन मानस का मनोबल सदैव बढ़ा रहा है, ”मेरे होते हुए, तुम्हें किसका डर ।”

इसलिए हम कह सकते हैं कि शिरडी साईं बाबा करुणावतार हैं, वे अपनी अनुकंपा एवं कृपादृष्टि से हमें आश्रय देते हैं और हमारे हृदय को, चेतना शक्ति को, पवित्र बनाते हैं।

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