गुरु वाक्य : श्री गुरुजी के वचनामृत |

- भाग्य की तुलना नहीं की जा सकती। प्रत्येक मनुष्य का प्रारब्ध अलग है। इस लिये दूसरे मनुष्य से अपने भाग्य की तुलना करने में या उसमें निहित भेद देख कर, अपने आप को कष्ट न दें (दुखी न हों)!
- दोषयुक्त अतीत और अनिश्चित भविष्य काल के करण हमें उत्तम वर्तमानकाल (आज) को नष्ट नहीं करना चाहिए।
- विचारों के मतभेद से दिलों में/मन में भेद न आने पाए। यदि हम इस बात को ध्यान में रखें तो हमारे जीवन की आधी से ज्यादा समस्याएं इसी से हल हो जायेंगी।
- दुनिया जीतने की बजाय, अपने मन पर विजय पायें। आप अपने मन पर विजय पा कर, दुनिया पर विजय पा सकते हैं।
- नकारात्मक विचारों को अपने पास न आने दें क्योंकि यह आपकी विचार धारा को ग्रसित कर, त्वरित दूषित कर देते हैं।
- दूसरों के अवगुण पर ध्यान न दें क्योंकि ऐसे करने से यह (अवगुण) आपमें घर कर लेंगे।
- दुनियाबी आकर्षण मनुष्य का इतना झकझोर देते हैं कि मनुष्य परमात्मा की रोशनी से बेखबर हो जाता है।
- सद्गुरु कल्पवृक्ष समान हैं जो सभी को फल और छाया देते हैं, उनको न मानने वालों को भी।
- ऐसे जीवन जीयें जैसे कि सारा विश्व आपका है, निर्वाण काल में ऐसे होइये जैसे आप सब से अलिप्त हैं।
- गुरु सदैव शिष्य के भीतर रहते हैं। जैसे ही मायावी आवरण उठता है तो (भीतर
के) गुरु के साक्षात दर्शन होते हैं।
श्री शिर्डी साईंबाबा |
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श्री गुरूजी |
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श्री शिर्डी साईं पीठ,बारीपदा |
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श्री शिरडी साईं बाबा – एक फकीर, जो कि अहमदनगर जिले के शिरडी नामक एक छोटे से गांव में अवत्तीर्ण हुए ,शिरडी साईं बाबा के पैतृक
श्री चंद्रभानु सतपथीजी स्वयं को श्री शिरडी साईं का महज एक चाकर मानते हैं - वे शिरडी साईंबाबा के द्वारा सिखाए गये मानवता
१४ अप्रैल २००१ के दिन पूजनीय गुरुजी ने, बारीपदा (उड़ीसा) में , श्री शिरडी साईं पीठ मंदिर का उद्घाटन किया। इससे पहले,