प्रश्नोत्तर |
श्रद्धेय गुरुजी श्री चन्द्रभानु सतपथी जी द्वारा रचित हिन्दी पुस्तक “बाबा आध्यात्मिक विचार ” में प्रकाशित भक्तों द्वारा श्री गुरुजी को पूछे गये कुछ सवाल और उनके जबाब–-
१. ‘साईं’ शब्द का क्या अर्थ है ?
साईं शब्द का मूल अर्थ है-स्वामी | विभिन्न भारतीय भाषाओं में ”साईं” शब्द के अलग अलग अर्थ है किए गए हैं, जैसे कि ईश्वर, मालिक, रक्षक, पति, धार्मिक शिक्षा प्रदान करने वाला, पिता अदि |
बाबा को ईश्वर, मालिक और पिता के रूप में पूजना चाहिए क्योंकि उनका प्रेम अनेकों रूप में प्रकटित है, जैसे कि अपनी संतान के प्रति पिता के प्रेम के कितने ही रूप होते हैं |
२. क्या अवतार और सद्गुरु एक हैं ?
अवतार या ईश्वर के रूप में ईश्वर ही मानव-मात्र कि सेवा के लिए आते हैं| जब भी धर्म का ह्रास होता है, तो धर्म के अभ्युदय के लिए अवतार आते हैं | इसके लिए यदि संहार भी करना पड़े, तो वे संहार करते हैं | अवतार दश रूप में आते हैं- मत्स्य, कूर्म्म, शकूर, नृसिंह, वामन, परशुराम, राम, बलराम, बुद्ध, कल्कि | ये सभी अंश अवतार हैं | केबल श्री कृष्ण ही इस पृथ्वी पर पूर्ण अवतार के रूप में आए थे | सभी अवतारों ने संहार कराया था | किन्तु सद्गुरुओं में संहार की प्रवृति कदापि नहीं रहती | किसी भी सद्गुरु ने किसी को मारा नहीं , चाहे लोगों ने उनको कितना भी कष्ट पहुँचाया है | यदि किसी ने उनको मारा भी तो उन्होंने मारने वालों के लिए भी येही प्रार्थना की कि- ‘ईश्वर उनको क्षमा करें’ | जब औंरगजेब ने संत सरमद का सर कटवाया था तो संत सरमद ने अपनी गर्दन कटवाने से पहले जल्लाद को माफ कर दिया था – तब अपने गला कटवाया था | क्षमा-गुण, कृपा-गुण ईश्वर के नित्य वस्तु हैं | ये ईश्वरीय गुण सद्गुरुओं में चरम रूप में होते है | सद्गुरु किसी को मारने कि अपेक्षा, उनमे परिवर्तन लाने के लिए स्वयं सहते रहे हैं | रोहिला भी जब बाबा को मारने आया था, तो बाबा ने उसे भी क्षमा करके उसका ह्रदय-परिवर्तन किया | सद्गुरु व्यष्टि के लिए आते हैं और अवतार समष्टि के लिए आते हैं | जब भी इस पृथ्वी पर अवतार आते हैं तो सद्गुरु ही उन्हें इस भूमंडल पर आकर्षित करके लाते हैं | अवतारों को प्रथम अवस्था में यह पता भी नहीं होता कि वे अवतार हैं | वे अपने पर परदा करके आते हैं, अर्थात अपने ईश्वरीय रूप को छिपा करके आते हैं | सद्गुरु ही उनका परदा हटाते हैं और उनके स्वरुप के बारे में ज्ञान करते हैं | जैसे कि संदीपनि ऋषि ने श्री कृष्ण को सुदर्शन-चक्र देते हुए कहा थी कि वे विष्णु के अवतार हैं या वशिष्ठ जी ने रामचंद्र जी के ब्रह्म-ज्ञान दिया था |
३. आज कि दुनिया में बाबा की शिक्षाओं की क्या प्रासंगिकता हैं ?
शिरडी के श्री साईं बाबा ने जो सर्बाधिक महत्वपूर्ण बातें हमें सिखाई हैं, वे हैं-
प्राणी-मात्र में प्रति प्रेम-चाहे वे पशु, पक्षी, कीट-पतंग ही क्यों न हो | बाबा स्वयं भोजन ग्रहण करने के पूर्व कुत्तों को खिलाते थे | उन्होंने कपडे धोने के काम में आने वाली एक व्यर्थ-सी चट्टान पर विराज कर उसके प्रति अपना प्रेम प्रकट किया | आज भी शिरडी में द्वारकामाई में वह चट्टान देखी जा सकती है | जो भी भक्त वहाँ जाते है, वे उसकी सेवा करते हैं | लोगों को बाबा से शिक्षा प्राप्त करनी चाहिए और उनकी शिक्षाओं परा अमल करना चाहिए | आज संसार में बाबा के भक्त इन दृष्टांतों से शिक्षाओं का पालन करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं | लोग गरीबों को खाना-कपडा बांटते हुए दिखलाई देते हैं | संसार भर में विभिन्न साईं-केंन्द्रों के माध्यम से ’नारायण-सेवा’ की जा रही हैं |
धार्मिक सहिष्णुता-शिरडी साईं बाबा ने हिन्दुओं, मुसलमानों एवं अन्य धर्म तथा सम्प्रदाय के लोगों को समान दृष्टि से देखा | आज भी सभी धर्मों के लोग बाबा के पास आते हैं | बाबा ने सदैव यह कहा है की सभी एक हैं और सबसे समान रूप से व्यव्हार करों | आज संसार में विभिन्न धर्मों के लोगों में बहुत असहिष्णुता है | लोगों को यह समझना चाहिए कि सभी मानव हैं, जिनका मालिक एक ही ईश्वर है | लोगों के धार्मिक विश्वास चाहे अलग-अलग हों लेकिन लक्ष्य तो सबका एक ही है | इस सन्दर्भ में वे आपस में अपने अनुभव बाँटते हुए दिखाई देते हीं और घुल-मिलकर प्रेम भाव से बातें करते हैं |वे दृढ़ता से यह विश्वास करते हीं कि तारे अनगिनत हो सकते हैं, लेकिन प्रकाश तो एक है | इसी प्रकार रास्ते अलग-अलग हो सकते हैं, परा मंजिल एक है |
जातिगत मेल-भाव-शिरडी साईं बाबा ने किसी को भी अस्पृश्य समझे जाने वाले लोगों के प्रति बुरा व्यवहार नहीं करने दिया | इसका उदाहरण बाबा स्वयं थे | शिरडी में उन्होंने भागोजी को – जो कि एक कोढ़ी थे, सदैव अपने पास रखा | उन्होंने ब्राह्मणों को कोढ़ी एबं अन्य अस्पृश्य लोगों के बरतन में खाना खिलाया | बाबा को जब लगा कि लोग उनके इस प्रकार के कृत्य के प्रति जुगुप्सा/घृणा का अनुभव कर रहे हैं, तो उन्होंने लोगों को फटकारा और कहा कि सब में ‘आत्मन’ है |उनका कहना था कि लोग यदि ऐसे लोगों के प्रति घृणा करते हैं, तो वे वस्तुतः उनके प्रति ही घृणा कर रहे हैं, क्योंकि वही आत्मन तो उनमे भी है | जो लोग बाबा को मानते हैं, उन्हें बाबा के कथानुसार आचरण करना चाहिए | प्राणिमात्र के प्रति सदभाव रखना चाहिए एवं आनंद्पूर्वक रहना चाहिए | अतः मानव-मात्र के प्रति भाई-चारे को मानो एवं ईश्वर को अपना पिता जानो |
श्रद्धा एवं सबूरी-बाबा ने भक्ति का जो मार्ग दिखलाया, वह है-श्रद्धा और सबूरी | इन्हीं में ईश्वरीय भक्ति का सार है | ‘श्रद्धा’ का अर्थ है – भक्तिपूर्ण निष्ठा | अर्थात अपने आराध्य के प्रति ऐसा आस्था भाव जिसमें कि विश्वास में दृढ़ता हो, चित्त में एकाग्रता एवं अनुराग हो और किसी भी परिस्थिति में वह परिवर्तित न हो तथा सुख या दुःख- हर स्थिति में आस्था दृढ बनी रहे कि जीबन में सुख या दुःख ईश्वर कि ही देन है | इस प्रकार सुख या दुःख हर परिस्थिति में बाबा को धारण करते हैं, तो स्थिरता बनी रहती है | गुरु के प्रति ऐसी श्रद्धा होने से हर स्थिति में लगता है कि वे हमारे साथ हैं | श्रद्धावान व्यक्ति सद्गुरु द्वारा बताये गए मार्ग पर चलने के लिए हर वास्तु को त्यागने कि क्षमता रखत है और जीबन में कैसी भी परिस्थिति हो, वह बाबा के ही पथ पर चलता है तथा दूसरी दिशाओं में नहीं भटकता |भक्ति की परीक्षा बिपरीत स्थितियों में होती है | अगर कोई बिपरीत स्थितियों में बाबा के प्रति अपनी श्रद्धा को स्थिर नहीं रख पाता है, तो धैर्य न होने के कारण ऐसी स्थिति में उसका भक्तिभाव भी डगमगा जाएगा |अतः बिपरीत स्थिति मैं भी उसे धैर्य रखना चाहिए कि बाबा उसके कष्ट को कम करेंगे और उसे विपरीत स्थिति से अवश्य निकालेंगे |
‘धीरज’ का अन्य अर्थ भी है | अर्थात जब भी ईर्ष्या, लोभ, क्रोध, अहंकार आदि के कारण कोई खराब भाव मन मैं उत्पन्न हो, तो गुरु का स्मरण करते हुए, सब कुछ सहते हुए किसी प्रकार कि कोई शिकायत न करते हुए,बाबा के प्रति पूर्ण विश्वास रखते हुए अपना कर्म करते रहना ही सबुरी है |
आज विस्वा भर में लोगों के जीवन में अधिकांश समस्याओं का कारण श्रद्धा एवं सबुरी का अभाव है | जीवन में श्रद्धा एवं सबुरी को धारण करने से सरल एवं मधुर बन जाता है |
इस प्रकार बाबा न केवल आज बल्कि आने वाले समय में और भी प्रासंगिक रहेंगे |
४. क्या पूर्व जन्म भी होता हैं ? क्या बाबा पूर्वजन्म में विश्वास रखते थे ?
हाँ | यदि आप ‘श्री साईं सतचरित्र” पढेंगे तो आप पाएँगे कि बाबा ने बहुत से लोगों के पूर्वजनामों के बारे में कहा है | उन्होंने केवल मनुष्यों के ही पूर्वजन्म के बारे में नहीं कहा है, बल्कि अन्य जिव यहाँ तक कि मेंढक, सांप आदि कि पूर्व जन्मों कि चर्चा की है | पिछले जन्म के अधूरे सम्बन्ध के कारण ही लोग आगे के जन्मों में एक -दूसरे के संपर्क में आते हैं | अपने पूर्वजन्मो से चले आ रहे ऋण-अनुबंध को मनुष्य को जिस अनुपात में चुकाता है, उसीके अनुरूप उसके जीबन में सुख-दुःख आते हैं | बाबा ने पूर्व के अपने किसी जन्म में एक महिला का अपनी बहन के रूप में उल्लेख किया है | यदि हम यह मानते हैं की हमारे सभी कर्म एक ही जन्म में होते हैं एवं उनका हिसाब-किताब उसी जन्म में चुकता हो जाता है तथा मृत्यु के पश्चात कुछ नहीं होता और आगे कोई जीबन नहीं होता , एक प्रश्न फिर भी अनुत्तरित रह जाता है की ईश्वर जो की दयाबन हैं और किसी भी प्रकार के भेदभाव के परे हैं, उसने लोगों को अलग-अलग स्थितियों में विभिन्न क्षमताओं के साथ क्यों उत्पन्न किया, जिसके परिणामस्वरुप कुछ लोग बहुत सुख भोगते हैं और कुछ को बहुत दुःख भोगने पड़ते हैं | मनुष्य एवं अन्य जीबों के सन्दर्भ में इस प्रकार के भेदभाव का यदि कोई अन्य तर्क होता तो ईश्वर को समदर्शी और सब्बके प्रति दयालु नहीं माना जाता |
५. क्या आप हमें यह बताएँगे की मृत्यु के पश्चात आत्मा कहाँ जाती है??
आत्मा एक सूक्ष्म ऊर्जा के रूप में है | मृत्यु के पश्चात वह उसी रूप में सूक्ष्म उर्जा के घेरे में रहती है | सूक्ष्म जगत का अनुभव करने के बाद वह तब तक धीरे धीरे विकसित होती रहती है, जब तक कि वह फिर से शारीर धारण नहीं कर लेती|
६. एक निर्द्दिष्ट उद्देश्य को पूरा करने के लिए जीबात्मा की श्रृष्टि—क्या यह सत्य है ?
हाँ , हम घर बनाने से पहले उसकी नक्सा बनाने की तरह ईश्वर भी हम सभीके नक्से बनाये है | हर इंसान की एक खास उद्देश्य पूरा करना होता है और उसी उद्देस्य को पूरा करने तक पृथ्बी पर हर जिबात्मा बने रहते है |
७. जीबन की मूल उद्देश्य क्या है ? हम इस पृथ्वी पर क्या कर रहे हैं ?
जीबन का मूल उद्देश्य आत्मानुभव है, जो कि दिब्य है | जब किसी को आत्मानुभव हो जाता है, तब वह पुनः जन्म नहीं लेता | हम सभी सांसारिक जीबन का अनुभव कर रहे हैं, जो कि हमारी चेतना का विकास करने के लिए आवश्यक है |
और अनेकों ऐसे सवाल और श्रद्धेय गुरूजी श्री चन्द्रभानु सतपथीजी द्वारा दिए गए उनके जवाबों का संकलन , आप श्रद्धेय गुरूजी रचित पुस्तक “बाबा अध्यात्मिक विचार” में पढ़ सकतें है
श्री शिर्डी साईंबाबा |
|
श्री गुरूजी |
|
श्री शिर्डी साईं पीठ,बारीपदा |
|







श्री शिरडी साईं बाबा – एक फकीर, जो कि अहमदनगर जिले के शिरडी नामक एक छोटे से गांव में अवत्तीर्ण हुए ,शिरडी साईं बाबा के पैतृक
श्री चंद्रभानु सतपथीजी स्वयं को श्री शिरडी साईं का महज एक चाकर मानते हैं - वे शिरडी साईंबाबा के द्वारा सिखाए गये मानवता
१४ अप्रैल २००१ के दिन पूजनीय गुरुजी ने, बारीपदा (उड़ीसा) में , श्री शिरडी साईं पीठ मंदिर का उद्घाटन किया। इससे पहले,